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Dipesh Gandhi, 2012-01-25 20:11:09
Dipesh Gandhi
अहिंसा : धर्म की आत्मा :- सदा दूसरे की ओर दौड़ने वाले चित्र का नाम कामना एवं वासना है। क्योंकि कामना दुःख है, वासना दुःख है। महावीर ने उसे वासना, तो बुद्ध ने उसे तृष्णा कहा है। नाम चाहे जो भी दें- वह दूसरे को चाहने की ही दौड़ है। वही दुःख है। मंगल क्या है? सुख क्या है? आनंद क्या है? निश्चित ही वह उस समय मिलेगा, जब हमारी वासना कहीं दौड़ नहीं रही होगी। वासना का दौड़ना आत्मा का खो जाना है। भगवान महावीर कहते हैं, 'अहिंसा संजमो तवो'। इतना छोटा सूत्र शायद ही जगत में किसी ने कहा हो जिसमें सारा धर्म समा जाए। अहिंसा धर्म की आत्मा है। धर्म का सेंटर है। तप धर्म की परिधि है और संयम केंद्र एवं परिधि को जोड़ने वाला बीच का सेतु है। ऐसा समझ ले अहिंसा आत्मा, तप शरीर और संयम प्राण है। वह जो दोनों को जोड़ती है- श्वास है। श्वास टूट जाए तो शरीर भी होगा, आत्मा भी होगी, लेकिन आप न होंगे। संयम टूट जाए तो तप भी हो सकता है, अहिंसा भी हो सकती है, लेकिन धर्म नहीं हो सकता। भगवान महावीर की दृष्टि में अहिंसा आत्मा है। अहिंसा पर क्यों महावीर इतना जोर देते हैं। महावीर कहते हैं अहिंसा, कोई कहता है परमात्मा, कोई कहेगा सेवा, कोई ध्यान, कोई योग, कोई प्रार्थना, कोई कहेगा पूजा। महावीर कहते हैं यह अहिंसा एवं तप दौड़ती हुई ऊर्जा को ठहराने की विधियों के नाम हैं। जब वह रुक जाएगी तो स्वयं में रमेगी, स्वयं में ठहरेगी, स्थिर होगी। जैसे कोई ज्योति वायु के वेग से कंपे नहीं वैसी। कामना व वासना अंदर की महत्वपूर्ण ऊर्जा को बहा ले जाने के कारण हैं व हिंसा के द्वार। जब तक ये द्वार बंद नहीं होंगे, तब तक हमारी ऊर्जा अहिंसा का सार्थक पुरुषार्थ नहीं कर पाती है। इसीलिए महावीर स्वामी कहते हैं, जहां कामना है, वासना (तृष्णा) है, वहां अहिंसा नहीं है और जहां अहिंसा नहीं, वहां धर्म भी नहीं हैं। http://www.facebook.com/groups/jaindharamkadeepknowledge/
 
Dipesh Gandhi, 2012-01-25 20:10:50
Dipesh Gandhi
अहिंसा : धर्म की आत्मा :- सदा दूसरे की ओर दौड़ने वाले चित्र का नाम कामना एवं वासना है। क्योंकि कामना दुःख है, वासना दुःख है। महावीर ने उसे वासना, तो बुद्ध ने उसे तृष्णा कहा है। नाम चाहे जो भी दें- वह दूसरे को चाहने की ही दौड़ है। वही दुःख है। मंगल क्या है? सुख क्या है? आनंद क्या है? निश्चित ही वह उस समय मिलेगा, जब हमारी वासना कहीं दौड़ नहीं रही होगी। वासना का दौड़ना आत्मा का खो जाना है। भगवान महावीर कहते हैं, 'अहिंसा संजमो तवो'। इतना छोटा सूत्र शायद ही जगत में किसी ने कहा हो जिसमें सारा धर्म समा जाए। अहिंसा धर्म की आत्मा है। धर्म का सेंटर है। तप धर्म की परिधि है और संयम केंद्र एवं परिधि को जोड़ने वाला बीच का सेतु है। ऐसा समझ ले अहिंसा आत्मा, तप शरीर और संयम प्राण है। वह जो दोनों को जोड़ती है- श्वास है। श्वास टूट जाए तो शरीर भी होगा, आत्मा भी होगी, लेकिन आप न होंगे। संयम टूट जाए तो तप भी हो सकता है, अहिंसा भी हो सकती है, लेकिन धर्म नहीं हो सकता। भगवान महावीर की दृष्टि में अहिंसा आत्मा है। अहिंसा पर क्यों महावीर इतना जोर देते हैं। महावीर कहते हैं अहिंसा, कोई कहता है परमात्मा, कोई कहेगा सेवा, कोई ध्यान, कोई योग, कोई प्रार्थना, कोई कहेगा पूजा। महावीर कहते हैं यह अहिंसा एवं तप दौड़ती हुई ऊर्जा को ठहराने की विधियों के नाम हैं। जब वह रुक जाएगी तो स्वयं में रमेगी, स्वयं में ठहरेगी, स्थिर होगी। जैसे कोई ज्योति वायु के वेग से कंपे नहीं वैसी। कामना व वासना अंदर की महत्वपूर्ण ऊर्जा को बहा ले जाने के कारण हैं व हिंसा के द्वार। जब तक ये द्वार बंद नहीं होंगे, तब तक हमारी ऊर्जा अहिंसा का सार्थक पुरुषार्थ नहीं कर पाती है। इसीलिए महावीर स्वामी कहते हैं, जहां कामना है, वासना (तृष्णा) है, वहां अहिंसा नहीं है और जहां अहिंसा नहीं, वहां धर्म भी नहीं हैं। http://www.facebook.com/groups/jaindharamkadeepknowledge/
 
Dipesh Gandhi, 2012-01-18 16:51:31
Dipesh Gandhi
जैन शास्त्रों तथा दूसरे धर्मग्रंथों में भी जीव की 84 लाख योनियाँ बताई गई हैं। जीव जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक इन्हीं 84 लाख योनियों में भटकता रहता है। ये ही 84 लाख योनियाँ 4 गतियों में विभाजित की गई हैं। (1) नरक गति : जीवन में किए गए अपने बुरे कर्मों के कारण जीव नरक गति प्राप्त करता है। इस पृथ्वी के नीचे सात नरक हैं, जिनमें जीव को अपनी आयुपर्यंत घनघोर दुःखों को सहन करना पड़ता है, जहाँ के दारुण दुःखों की एक झलक छहढाला नामक ग्रंथ में कही गई है।' मेरु समान लोह गल जाए ऐसी शीत उष्णता थाय।' अर्थात सुमेरु पर्वत के समान लोहे का पिंड भी जहाँ की शीत एवं उष्णता (गर्मी) में गल जाता है तथा 'सिन्धु नीर ते प्यास न जाए तो पण एक न बूँद लहाय' अर्थात समंदर का जल पीने जैसी प्यास लगती है, पर पानी की एक बूँद भी नसीब नहीं होती। ऐसे नारकीय कष्टों का शास्त्रों में विस्तृत वर्णन दिया गया है। 2.तिर्यन्च गति : जीव को अपने कर्मानुसार जो दूसरी गति प्राप्त होती है वह है तिर्यन्च गति। अत्यधिक आरंभ परिग्रह, चार कषाय अर्थात क्रोध, मान, माया, लोभ एवं पाँच पापों अर्थात हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील एवं परिग्रह में निमग्न रहने वाले जीव को तिर्यन्च गति अर्थात वनस्पति से लेकर समस्त जीव जाति तथा गाय, भैंस, हाथी, घोड़ा, पक्षी आदि गति प्राप्त होती है। निर्यन्च गति के घोर दुःख ऐसे हैं- 'छेदन भेदन, भूख पियास, भारवहन हिम आतप त्रास। वध, बंधन आदिक दुःख घने, कोटि जीभ ते जात न भने।' (3) मनुष्य गति : तीसरी गति मनुष्य गति होती है। जो जीव कम से कम पाप करता हुआ निरंतर धर्म-ध्यान में जीवन व्यतीत करता है। उसे मनुष्य गति प्राप्त होती है। समुद्र में फेंके गए मोती को जैसे प्राप्त करना दुर्लभ है, उसी प्रकार यह मानव जीवन भी महादुर्लभ है, जिसको पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। (4) देव गति : चौथी गति देव गति होती है। इस पृथ्वी के ऊपर 16 स्वर्ग हैं। जीव अपने कर्मानुसार उन स्वर्गों में कम या अधिक आयु प्रमाण के लिए जा सकता है। इसको पाना अत्यंत ही दुष्कर है। निरंतर निःस्वार्थ भाव से स्वहित एवं परहित साधने वाला जीव ही देव गति की उच्चतम अवस्था को प्राप्त करता है। इस प्रकार उपरोक्त चारों गतियों से अर्थात 84 लाख योनियों से छुटकारा पाकर ही जीव मोक्ष प्राप्ति कर सकता है अन्यथा नहीं। अतः मानव को इस जीवन में हमेशा पाप कार्यों से निवृत्त रहकर तथा धर्म एवं सद्कर्मों में प्रवृत्त रहकर मोक्ष नहीं तो कम से कम सद्गतियों अर्थात देवगति एवं मनुष्य गति में अगला जन्म हो, ऐसे कार्य करके मानव जीवन को सार्थक करना चाहिए।
 
Dipesh Gandhi, 2012-01-10 18:02:39
Dipesh Gandhi
આત્મા નથી, પરભવ નથી, વળી પુણ્ય પાપ કશું નથી, મિથ્યાત્વીની કટુ વાણી મેં, ધરી કાન પીધી સ્વાદ થી. રવિ સમ હતા જ્ઞાને કરી, પ્રભુ આપશ્રી તો પણ અરે, દિવો લઈ કૂવે પડ્યો, ધિIાર છે મુજને ખરે આત્મા નથી, પરભવ નથી. આ પ્રકારની માન્યતા અન્ય દર્શનોમાં દર્શાવવામાં આવી છે. આપણે આ દુનિયામાં બીજા લોકોના પણ સંપર્કમાં હોઈએ છીએ. તે લોકોના પ્રચારકો પોતાના ધર્મનો પ્રચાર કરતા હોય છે. અને આપણે તેમની વાતોમાં કોઈ ને કોઈ રસ લેતા હોઈએ છીએ. વિશ્વમાં ભિન્ન ભિન્ન માન્યતા ધરાવનારા મનુષ્યો છે. જૈન દર્શન કહે છે આત્મા છે તેજ કર્મોનો કર્તા છે. અને તેજ ભોક્તા છે. પુરૂષાર્થ દ્વારા કર્મોને ખપાવી તેજ આત્મા, પરમાત્મા બની શકે છે. જ્યાં સુધી સર્વ કર્મથી મુક્ત ન થાય ત્યાં સુધી ચાર ગતિમાં પરિભ્રમણ કરવું પડે છે. ગત જન્મના પુન્ય-પાપ અનુસાર જ આગામી ભવોમાં સુખ દુખ મળશે આવો નIર કર્મવાદ જૈન દર્શનમાં છે. જૈનો માને છે કે સંપૂર્ણ કર્મનો ક્ષય થાય તેને મોક્ષ કહેવાય. જૈન દર્શનમાં મુખ્ય જીવ અને અજીવ તેમ બે મુખ્ય અગત્યના તત્વોમાં માને છે. પýિામના દેશોનું દર્શન કહે છે ખાઓ-પીઓ ને મોજ કરો. કાલની કોને ખબર છે. `આ ભવ મીઠો તો પરભવ કોણે દીઠો' તેઓ કહે છે કરજ કરવું પડે તો કરીને પીઓ. મોજ મજા કરો. પરભવમાં તેઓ માનતા નથી. તેઓ કહે છે કે મૃત્યુ પછી ચ્ર્ઢડ Eત્ઠ્ઠ સર્વ પૂર્ણ થાય છે. આત્મા નથી, પરભવ નથી, પાપ-પુન્ય કશું નથી. આવું માનનારા અને ધર્મની વાતોને હસી નાખનારા લોકોનું પણ અસ્તિત્વ છે. તેમ માનનારાને સાચો ને સત્ય ધર્મ મળ્યો નથી. તેમને વીર જેવા ભગવંત મળ્યા નથી. આવા વિવિધ સ્વાર્થી લોકો સાથે રહીને આપણે જૈનદર્શન સાચવી રાખવાનું છે. વીરતી વાણીમાં શ્રદ્ધા ન ડગે તો ન જ ડગે. સર્વને મજા કરવી છે. પ્રભુ વીર કહે છે હસતા હસતા કરેલા કર્મ રોતાં રોતાં પણ છૂટતા નથી. જૈન દર્શન મળ્યું છે તો ભવ સુધારી લો. રત્નાકર-આચાર્યશ્રી કહે છે કે આવી ભિન્ન ભિન્ન માન્યતાઓ છે. બીજા દર્શનને આત્મા દેખાતો નથી. જીવ ક્યાં જાય છે. આત્મા કેવો છે! હોય તો બતાડો. તેનું વજન કેટલું છે તે દેખાવમાં કેવો છે! તે કેવી ગતિ કરે છે. આવા અનેક સવાલોના જવાબ નથી. તેથી તેઓની માન્યતાને પૃષ્ટિ મળે છે. ભાવતું તું ને વૈધે કહ્યું. મોજ મજા કરવી છે. પાપનો ડર નથી રાખવો. તેથી તેઓ તેમનું દર્શન કહે છે તેને તેઓએ વધાવી લીધું છે. જૈન ધર્મ કહે છે આત્મા છે. તે નિત્ય છે. અને અમર છે. તે કર્મોને કરનારો છે. કર્મનો કર્તા છે અને ભોક્તા છે. તેનું અસ્તિત્વ શ્રદ્ધાથી અને સ્વાનુભવથી સમજાય છે. હવા આપણને ક્યાં દેખાય છે! છતાં તેનું અસ્તિત્વ છે. કલ્પસૂત્રમાં કહ્યું છે આત્મા શબ્દ ક્યાંથી આવ્યો. વિશ્વમાં જે કંઈપણ ચીજ છે તેનું નામ છે. આત્મા નથી તો આત્મા નામનો શબ્દ આવ્યો ક્યાંથી! વળી એ લોકો વિજ્ઞાનનો સહારો લઈ આજે કહે છે તે કાલે જુદું જ કહે છે. વિજ્ઞાનની કોઈ એક બાત નથી. તે બોલીને ફેરવી તોળે છે. જૈન દર્શન કેવળજ્ઞાનીઓ જે કહ્યું છે તે સનાતન સત્ય હોય છે. કોઈ પણ ફેરફાર નહિં. અનંતા અનંત વર્ષોથી એક જ વાત. મારો આત્મા એક છે. શાશ્વત છે તથા જ્ઞાન-દર્શનથી યુક્ત છે. બાકી સર્વ સંયોગજન્ય વિભાવો. શ્રી રત્નાકર આચાર્ય મિથ્યાત્વ જીવોની એક પછી એક માન્યતા દર્શાવી છે. તેઓ માને છે કે આત્મા નથી. પરંતુ ઉપરોક્ત અનેક રીતે જૈન દર્શન આત્માના અસ્તિત્વને સિદ્ધ કરે છે. જૈન ધર્મમાં આત્માનો સ્વભાવ મોક્ષ કહ્યો છે. અને તેના ઉપાયો પણ કહ્યા છે. તેમાં મોક્ષનું સનાતન સુખ દર્શાવવામાં આવ્યું છે. વળી પાપ-પુન્ય કશું નથી. મિથ્યાત્વી જીવો તો પાપ-પુન્યમાં માનતા નથી. તેથી દાનના , પરોપકારનાં કે માનવ કલ્યાણના કાર્યે કરી પુન્ય ઉપાર્જન કરવું કે પાપથી બચવાનું એને મન નથી થતું. બેફામ રીતે જીવન વીતાવ્યે જાય છે. એક સંત કહે છે. પાપમાં ન માનનારા જ્યારે અનહદ દુખી થાય છે ત્યારે ઓ ગોડ, ઓ ગોડ. ભગવાન યાદ આવી જાય છે. મોજöમજા કરતી વેળા પ્રભુ યાદ નથી આવતા. કહેવાય છે ને! સુખમાં સાંભરે સાહ્યબી. દુખમાં સાંભરે મા ને બાપ. અર્થાત્ ભગવાન સાંભરે છે, ધર્મ સાંભરે છે. છેવટે તો વીરની વાણી જ સંપૂર્ણ સત્ય પૂરવા થઈ છે. જ્યારે જીવ કંઈક ભોગવવું પડે તથા જ્યારે કોઈ થપાટ વાગે ત્યારે જ મિથ્યાત્વી જેવી નાસ્તિક્તા છોડીને આસ્તિક બની જાય છે. લોકવ્યવહારમાં કહે છે. `વાંકો રહે ત્યારે સમજે છે.' મિથ્યાત્વની વાતો મોજમજાને પ્રોત્સાહન આપે તે પાપ-પુન્ય નથી. તેવી રસપૂર્વક સાંભળી. આવા નાસ્તિક લોકો પોતાની વાતો સામા માણસના મગજમાં ઠસાવવા ઘણી જાત પ્રપંચ કરતા હોય છે. પરંતુ હું તો વીરનો પુત્ર છું. હું જિન ભગવંતને માનનારો છું. એક શ્રાવક છું જૈન છું મને શું! તેવો ગર્વ મેં ન કીધો. પ્રભુ!તેનું જ્યાં થયું હોય તો હે વિભુ!હું ક્ષમા યાચું છું હે પ્રભુ! મારી દશા કેવી થઈ છે! શાસ્ત્રાેના મૂળ સુરયોને મેં કંઠસ્થ ન કર્યા. મારા કષાયોને વિષયોને હું વશ ન રાખી શક્યો. હાથમાં દીપક હોવા છતાં હું કૂવામાં પડયો અને ભવભવાંતરમાં રમવાડાના મેં વર્તંન કર્યું. મારી પાસે શ્રુતજ્ઞાન હોવા છતાં હું ઊંડી ખાઈમાં પડયો. હે પ્રભુ! મને બચાવો!મને ધિક્કાર છે હે પ્રભુ ! મારા ઉપકાર કરી મને ઉગારો. http://www.facebook.com/groups/276833759006869/
 
Dipesh Gandhi, 2012-01-03 12:33:46
Dipesh Gandhi
परलोक की विशिष्ट विवेचना ****************** सामान्यतः ‘परलोक’ शब्द से ‘मृत्यु के बाद प्राप्त होनेवाली गति’ ऐसा अर्थ समझा जाता है, और उसे सुधारने के लिये हमें कहा जाता है। परन्तु जिस गति में हमें भविष्य में जन्म लेने का है उस गति का समाज यदि सुधरा हुआ न हो तो उस समाज में भविष्य में जन्म लेकर, हम चाहे जैसे हों फिर भी सुखी नहीं हो सकते। देवगति और नरकगति के लोगों के साथ हम तनिक भी सम्पर्क इस जन्म में स्थापित नहीं कर सकते। अतः यदि हम कुछ सुधार का कार्य करना चाहें तो मनुष्यसमाज तथा पशु-समाज के बीच रहकर उनके बारे में ही कर सकते हैं। उस सुधारणा का लाभ हमें इस जन्म में तो मिलेगा ही, परन्तु साथ ही भविष्य के जन्म के समय (मनुष्य अथवा पशुलोक में पुनर्जन्म होने पर) भी मिल सकता है। अतः जहाँ तक हमारा अपना सम्बन्ध है वहाँ तक ‘परलोक’ शब्द का ऐसा विशिष्ट अर्थ भी करना चाहिए जिससे मनुष्यसमाज तथा पशुसमाज के साथ के हमारे कर्त्तव्यों का हमें भान हो और वैसे कर्त्तव्यों का पालन कर के हम इस लोक के साथ साथ हमारे पर लोक (मृत्यु के बाद के जीवन) को भी सुधार सकें। इस दृष्टि को सम्मुख रखकर नीचे की विचारणा प्रस्तुत की जाती है। परलोक अर्थात् दूसरे लोग-हमारे खुद के सिवाय के दूसरे लोग। परलोक का सुधार अर्थात् दूसरे लोगों का सुधार। हमारे अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति के सम्मुख परिचित और नित्य सम्पर्क में आनेवाले दो लोक तो स्पष्ट हैं : मनुष्यसमाज और पशुसमाज। इन दो समाजों को सुधारने के प्रयत्न को परलोक की सुधारणा का प्रयत्न कह सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य यदि दृढ़रूप से ऐसा समझने लगे कि हमारा दृश्यमान परलोक यह मनुष्यसमाज और पशुसमाज है और परलोक की सुधारणा का अर्थ इस मानवसमाज और पशुसमाज को सुधारने का होता है, तो मानवसमाज का चित्र ही बदल जाय और पशुसमाज की ओर भी सद्भावना जाग्रत् हो उठे जिससे उनके लिये खाने-पीने, रहने आदिका सुयोग्य प्रबन्ध किया जा सके। मानवसमाज के सुख-साधन में पशुसमाज का हिस्सा क्या कम है? अमेरिका आदि देशों की गोशालाएँ कितनी स्वच्छ और व्यवस्थित होती हैं! मनुष्य मरकर कहाँ जन्म लेगा वह निश्चित नहीं है। अतः उसे वह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यदि मानवसमाज और पशुसमाज नानाविध बुराइयों और बीमारियों के कारण दुर्गतिरूप होगा तो मरकर उसमें जन्म लेनेवाला वह (मनुष्य) भी दुर्गति में ही पड़ेगा। इसलिये लोकहित और स्वहित दोनों दृष्टिओं से अपना आचरण और व्यवहार इतने अच्छे रखने की आवश्यकता उपस्थित होती है जिससे कि इन दोनों समाजों के ऊपर बुरा प्रभाव पड़ने के बदले अच्छा प्रभाव पड़ता रहे। नगरपालिका (Municipality) जिस प्रकार नगर के सब नागरिकों के लिये सुख की वस्तु बनती है उसी प्रकार हमारे मनुष्य तथा पशु संसाररूपी नगर की म्युनिसिपैलिटी उसे नगर के सब नागरिकों के सुख की वस्तु बन सकती है। अतः इन दोनों वर्गों को सुधारने के लिये यदि प्रयत्न किया जाय-तत्परता रखी जाय तो वह वस्तुतः हमारे अपने परलोक को सुधारने का प्रयत्न होगा। दूसरा एक परलोक है मनुष्यों की प्रजा-सन्तति। मानव-शरीर द्वारा होनेवाले सत्कर्म अथवा दुष्कर्म के जीवित संस्कार रक्तवीर्य द्वारा उसकी सन्तीति में आते हैं। मनुष्य में यदि कोढ़, क्षय, प्रमेह, केन्सर जैसे संक्रामक रोग हों तो उसका फल उसकी सन्तति को भुगतना पड़ता है। मनुष्य के अनाचार, शराबखोरी आदि दुर्व्यसनों के कारण होनेवाले पापसंस्कार रक्तवीर्य द्वारा उसकी सन्तति में आएँगे और वे मानवजाति की घोर दुर्दशा करेंगे। अतः परलोक को सुधारने का अर्थ है संतति को सुधारना, और सन्तति को सुधारने का अर्थ है अपने आप को सुधारना। जिस प्रकार मनुष्य का पुन्रजन्म रक्तवीर्य द्वारा उसकी सन्तति में होता है उसी प्रकार विचारों द्वारा मनुष्य का पुनर्जन्म उसके शिष्यों में तथा आसपास के मनुष्य में होता है। हमारे जैसे आचार-विचार होंगे उनका वैसा ही प्रभाव शिष्यों तथा निकटवर्ती लोगों पर पड़ेगा। मनुष्य एक ऐसा सामाजिक प्राणी है कि जान में अथवा अनजान में उसका प्रभाव दूसरों पर और दूसरों का प्रभाव उस पर पड़ने का ही। मनुष्य के ऊपर अपने आप को सुधारने का अथवा बिगाड़ने का उत्तरदायित्व तो है ही, परन्तु साथ ही साथ मानवसमाज के उत्थान अथवा पतन में भी उसका हिस्सा साक्षात् अथवा परम्परया रहता ही है। रक्तवीर्यजन्य सन्तति अपने पुरुषार्थ द्वारा पितृजन्य कुसंस्कारों से शायद मुक्त हो सके, परन्तु यदि विचारसन्तति में विष का संचार हो तो उसे पुनः स्वस्थ करना प्रायः दुष्कर ही हो जाता है। आज के प्रत्येक व्यक्ति की नजर इस नई पीढ़ी पर लग हुई है। कोई इसे मजहब की शराब पिला रहा है तो कोई हिन्दुत्व की; कोई जाति की तो कोई कुलपरम्परा की। न मालूम कित-कितने प्रकार की विचारधाराओं की चित्र-विचित्र शराब मनुष्य की दुर्बुद्धि ने तैयार की है? और अपने वर्ग की उच्चता, अपने अधिकार के स्थायित्व तथा स्थिर स्वार्थों की रक्षा के लिये धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय आदि अनेकविध सुन्दर व मोहक पात्रों में भर भर कर भोलीभाली नूतन पीढ़ी को पिला कर उसे स्वरूपच्युत किया जाता है। वे इसके नशे में चूर हो कर और मनुष्य की समानता के अधिकार को भूलकर अपने भाइयों के साथ क्रूरता एवं नृशंसतापूर्ण व्यवहार करने में झिझकते नहीं हैं। आज के ऐसे विचित्र और कलुषित युग में जहाँ मनुष्यों की यह दशा है वहाँ पशुरक्षा तथा पशुसुधार की बात ही क्या करना? http://www.facebook.com/groups/276833759006869/
 

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